भूमिका

इस भाषा में मैथिल’ हिन्दू और मुसलमान, सब ने ग्रन्थ लिखा और यह साहित्य कम-से-कम छ: सौ वर्ष से विविध विषयों में पूर्ण हे। मुसलमानों ने मैथिली में मसिआ भी लछिखा—यथा :

एहि दसो दिन सेयद बसवा कटोलके रे हाय हाय।
से हो बसवा भेले बिसरनमा रे हाय हाय॥।
एहि दसौ दिन सेयद लकड़ी चिरोलक रे हाय हाय।
से हो लकड़ी भेले बिसरनसा रे हाय हाय।

आज कल भी यथेष्ट संख्या में मैथिल अपनी मातृभाषा में ग्रन्थ लिख कर अपनी परम्परागत साहित्य-सम्पत्ति की वृद्धि कर रहे हे ।

जैसा कि ऊपर कहा गया हैँ यह संग्रह अपूर्ण है । “राकेश” जी के पास अभी और बंहुत सामग्री है। केवल नचारियों’ की ही संख्या एक सहस्र के लगभग होगी। नचारी मिथिला की एक विशेष वस्तु हें। कई सौ वर्ष से शिव-भक्ति-पूर्ण ये गान वहां गाये जाते हे—आईने-अकबरी” में इसकी चर्चा है, विद्यापति के समय से अब तक इसकी रचना होती आई है । चन्द्र कवि के (जिनको अपनी बाल्यावस्था में में प्रातः नित्य देखा करता था और जिनका रचित “’मैथिलीभाषा रामायण” एक विलक्षण ग्रन्थ है) दो नचारी में यहाँ उद्धृत करता हूँ।

( १)


चल शिव कोवराक चालि है, दोपदा ओढ्‌ भोला।
अछि भरि नगर हकार हे भलमानुस ठोला॥
हाइक हार निहारि है हेरथि बघछाला।
हसति बसति सति आज हे जत आओति बाला॥।
भूबवरराज जमाय हे छाउर कर त्यागें।
बहु विधि अतर सुगन्ध हे रछागत अंग रागे॥।
प्रणत कहथि कवि चन्द्र’ हे सनु शम्भु निहोरा।
एसनहु धरि कि सुखाय हे रानिक देगनोरा॥।

( २)

शिव प्रिय अभिनव गीत प्रीति सां रचितहूँ।
शिव-तट विगत विकार भक्ति सों नचितहेँ॥
महोदार॒ करुणावतार काँ जँचितहूँ।
अन्त समय हम काल कराल से बचितहुँ।॥।
अछि भरोस सन मोर दया प्रभू करता।
दरणागत जन जानि सकल दूख हरता॥॥
मोर जीव दुखिया जानि सदाशिव ढड़ता।
जे चाहथि से करथि भवानी भरता॥

विद्यापति के पद जो अन्य प्रदेशों में प्रसिद्ध हे अधिकतर राधा-कृष्ण विषयक हे, परन्तु उनके रचित अनेक उत्तम नचारी भी हं–यथा :

घर घर भरमि जनम नित
तनिकाँ केहन विवाह। से आब करब गौरीवर
ई होए कतय निवाह॥। कतय भवन कत. आँगन
बाप कतय कत. साथ। कतहूँ ठओर नहिं ठेहर
ककर एहन जमाय । कोन कयल एह असुजन
केओ न हिनक परिवार। जे कयल हिनक निबन्धन
धिक थधिक से पजिआर॥ कुल परिवार एको माँह जनिका
परिजन. भूत बेताल। देखि देखि भुर होय तन
के “सहय हृदयक सालू॥ “विद्यापति कह सुन्दरि
धरहु मन अवगाह।
जे अछि जनिक विवाही
तनिकाँ. सेह प नाह॥

‘इयामा-चकेवा” के सम्बन्ध में पाठकों को यह जानकर उत्सुकता होगी कि इसका उल्लेख ‘पद्मयुराण” में है। ‘समदाउमि” एक बहुत्त ही करुणोद्भावक राग में गाई जाती हे–विदा के काल की यह वस्तु है। संस्कृत साहित्य’ में इसका विशिष्ट उदाहरण “अभिन्ञानशाकुन्तल” के “इलोकचतुष्टयम्‌” में है। ,समदाउनि कई अवसर पर गाई जाती है। नवरात्रि के पश्चात्‌ जब दुर्गापूजा समाप्त होती है, तब का एक गीत यह है :

कि कहब जननि कहय नह आवय छमिअ सकल अपराध ॥।

नवओ रतन नव मास वितित भेल तुअ पदलगि परमान।

चललहुँ आज तेजि सेवक गण आकुल सब हक परान॥

सून भवन देखि थिर न रहत हिअआ नयन भहरि रह नोर।

गदगद बोल अस्ब तन थर थर हेरि अलोचन कोर॥

कन्या जब माता पिता से विदा होकर सस्‌राल जाती हे उस समय उसको सम्बोधित करती हुईं समदाउनि:

घधिया हे रहब सबहक प्रिय जाय॥॥ एतय छलहूँ सभ के अति प्रिय भेलि नेनपन देखि जड़ाय। ओतय रहब सभ के अनुचरि भेलि भेटति ओतय नह माय॥। नेनपन से हम कतेक सिखाओल बहुत बुझाय बुझाय। जइतह ओतय रहब तहिता भेलि जन्‌ दिअ नाम हेसाय ( बाजि सकी नह, |बहुत कहब को आब कहल नह जाय। न मैथिली लोकगीत सेवा सभक करब तत्पर भय लेब हम तुरन्त अनाय॥। छोड़थि पेर नहिं माय कहथि नहिं गदगद केंठ सुखाय। भन विम्ध्यनाथ” वियोग काल में कानब एक उपाय॥

और आम की फसल समाप्त होने पर समदाउनि : फल हे! तेजह किएक समाज। तोहर्राह बसें किछ गनल न उचनिच छोड़ल गेहक काज। तुअ गण अवुधि छुब॒ंध मन होएत ई तोहि कत गोट राज॥ मन अभिलाष राख हम धयलहूँ यतनहि हृदय नुकाय। उसड़ि उसड़ि से मगन ओतहि की एहन कठिन हिअ हाथ ॥ कोमल सरस विदित त्रिभुवन तों अकपट तथिनँ. विशेष। प्रकृत बुभल तुअ गरलू भररू हा सरल मनोहर वेष॥। गदगद स्वर पुलकित तन थरथर आब कहल नें जाय। भन गणनाथ’ उदास कहब कत थकलरूहूँ बहुत बुराय ॥॥ चौठ चन्द के गीत, प्रभाती, ताजिया के गीत, रास, मान, योग, उचती, लगती, चाँचर, विरहा, मंगल इत्यादि और अनेक प्रकार के लोकगीत हें, जिनका संग्रह राकेश जी ने किया है और जो, यदि सम्भव हुआ, तो द्वितीय भाग में प्रकाशित होंगे। हमें आशा हे कि साहित्य-प्रेमी इनको आदर की दृष्टि से देखेंगे और इनमें यथाथ भारतीय संस्कृति की भलंक पायेंगे।

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