प्रवकथन

मिथिला प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण प्रान्त है। इसकी लावण्यमयी मंजूल मूत्ति, मधूरिमा से भरं। हुई सरस वेला और उन्मादिनी भ बनायें किसके हृदय को नहीं यृदगुदा देतीं ? यहाँ के वसन्तकालीन सुहावने समय, बाँसों के कुरमूट में छिपी गिलहरियों क प्रेमालाप, सुरड्िजित सुन्दर पुष्प, सुचित्रित पशु-पक्षीी और कोमल पत्तियों के स्पन्दन अपने इंदं-गिर्द एक उत्सुकतापूर्ण रहस्यमय आकर्षण पैदा कर देते हैं। कहीं ऊदे-ऊदे बादलों: की आँखमिचौनी, कहीं फभहर-ऋहर करती हुई बलखाती नदियों की अठ- खेलियाँ, कहीं धान से हरे-भरे लहलहाते खेतों की क्यारियाँ–मतलब यह कि यहाँ की जमीन का चप्पा-चप्पा और आसमान का गोशा-गोशा काव्य की सुरभि से सुरभित हो रहा हँ और संगीत की निर्मल निर्भेरिणी सदा अविराम गति से कमल करती हुईं दोड़ रही हे ।

मिथिला” नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तक के लेखक श्री लक्ष्मण भा के अनुसार मिथिला पूरव से पदेचम तक १८० मील और उत्तर से दक्षिण तक १२५ मील हं। इसका क्षेत्रफल २२५०० वर्गमील हें। दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूृणिया, चम्पारन, उत्तर भागलपुर तथा उत्तर मुंगेर के जिले इसके अन्तर्गत हें। पश्चिम की ओर सदानीरा–शालग्रामी तथा पूरब की ओर कौशिकी के बीच की तराई भी इसमें सम्मिलित है। पाँच हजार वर्षों को पार कर चला आता हुआ इसका इतिहास संसार के प्राचीनतम इतिहास के रूप में#प्रतिष्ठित हे। इसकी जमीन का भूतात्त्विक रचना-काल पाँच लाख वर्ष प्राचीन हे, और भूगर्भवेत्ताओं के अनुसार इसका भूपृष्ठ पृथिवी के भूपुष्ठ की अपेक्षा आधुनिक हैँ। आज सेलरूगभग दस लाख वर्ष पूर्व इस प्रदेश की स्थिति जिसको हम मिथिला कहते हे बसी नहीं थी, जैसी कि आज है । यह समुद्र का ही एक खंड था जो विन्ध्य-गिरि-मेखला से हिमालय को विभक्‍त करता था, और पश्चिम- ‘पयोधि—अरब सागर को बंगाल की खाड़ी-पूर्व सागर से मिलाता था। उस समय शैलाधिपति हिमालय समुद्र के गर्भ में ही समाधि-मग्न था।

मगही

मिथिला के पुर और जनपद दोनों ही नदियों के आश्रित हें, और कई दृष्टियों से धन-धान्‍्य की थात्री इन नदियों का अस्तित्त्व अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यदि दक्षिण भारत के निवासियों की मनोभूमि को रमणीय पर्वृतों तथा गम्भीर द्रोणियों का सान्निध्य–सख्यभाव प्राप्त हे तो मिथिला- वासियों की मानस-भूमि को स्वच्छसलिला नदियों की प्राणदायिनी धारा अपने जीवन-रस से तिड्चित करती हे, जिसका प्रमाण तीरभुक्ति” (नदी- किनारे की भूमि अथवा नदी-तटवर्त्ती प्रदेश) शब्द में उपलब्ध होता हे । यहाँ की’ भाषा मैथिली हे, जिसकी लिपि देवनागरी शिपि से थोड़ी भिन्न है, और उसमें बंगला-लिपि का आभ.स दृष्टिगोचर होता है। बिहार की प्रादेशिक भाषाएँ तीन हें— (क) मैथिली, (ख) मगही, और (ग) भोजपुरी। मेथिली चम्पारन, दरभंगा, पूर्वी मूँगेर, भागलपुर, पूर्णिया के पश्चिमी और मुजफ्फरपुर के पूर्वी भागों में बोली जाती है । लेकिन दरभंगा जिले के गाँवों में ही यह अपने शुद्ध रूप में प्रचलित है। मैथिली और मगही एक दूसरे के अधिक निकट हें, और इन दोनों प्रादेशिक भाषाओं के बोलने- वार्लों के रीति-रिवाज और रहन-सहन में भी कोई विशेष अन्तर नहीं। ‘उच्चारण के लिहाज से भी मैथिली और मगही भोजपुरी की अपेक्षा एक- दूसरे से अधिक मिलती-जुलती है । मैथिली में स्वर वर्ण अ’ का उच्चारण स्पष्ट और मबुर होता है। भोजपुरी में स्वर वर्ण का उच्चारण (मध्यभारत में प्रचलित भाषाओं की तरह) थोड़ा रूखा है। इन दोनों भाषाओँ— मैथिली और भोजपुरी का यह जतर इतना स्पष्ट है कि इनके जुदे-जुदे लिबासों को पहचानने में देर नहीं होती। संज्ञाओं के शाब्दिक रूपकरण की दृष्टि से भोजपुरी में सम्बन्धकारक का रूप सरल नहीं हे। मैथिली और मगही में मध्यम पुरुष का रूप, जो अक्सर बोल-चाल में इस्तेमाल होता है, अपने’ है, और भोजपुरी में “रऊरे। मैथिली को “छई और अछि” क्रियाओं के बदले मगही में है“, और भोजपुरी में बाटे,, बारी’, और “हबे’ प्रयुक्त होते हे। अन्य’ भारती भाषाओं की तरह क्रिया-विशेषण के संयोग से वर्तमान काल बनाने में ये तीनों प्रादेशिक भाषाएं एक-सी हें। मगही का वर्त मान काल दिखा है भी एक सिफत रखता है । भोजपुरी में देखा है’ के बदले देखे ला” इस्तेमाल होता है। मैथिली और मगही में क्रिया के भिन्न-भिन्न रूपान्तर–धातुरूप सरल नहीं हें। उनके पढ़ने और समभकने में पेचीदगी पैदा होती है । लेकिन बंगाली और हिंदी की तरह भोजधुरी के धातुरूप साफ-पथरे और बाअसर हैं । इनके पढ़ने और समभने में दिमाग में पसीना नहीं आता, और न इनके शब्द मन में अलग-अरूग तस्वीरें पैदा करते हे। इन तीनों प्रादेशिक भाषाओं में और भी कितने अन्तर हैं। लेकिन ऊपर जो भेद दिखलाये गये हे वे ज्यादा उपयोगी और उल्लेखनीय हे ।

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मैथिली ग्राम-साहित्य-सागर के विस्तीर्ण अन्तस्तल में न मालूम कितने अनमोल सुन्दर हीरे यत्र-तत्र बिख रे पड़े है, जो एकता के सूत्र में पिरोये जाने पर हिन्दी-साहित्य के भंडार को पूर्ण बना सकते हैं । मेथिल ग्रामीण कवियों ने साहित्य के विभिन्न पहलओं, जसे–नाटिकाएँ, विनोद-पद, कहानियाँ, पहेलियाँ, कहावतें आदि सभी को समान-रूप से स्पर्श किया हैे। वे अपने परिमाजित और संयत गीतों के रचयिता ही नहीं, बल्कि अनेक नूतन छन्‍्दों और तालों के उत्पादक भी हैं। हाँ, कहीं-कहीं एक ही छन्द बहुरूपये-स। रूप बदल कर जुदा-जुदा लिबासों में प्रकट हुआ है । उनम कुछ ऐसे है, जो तेज रेती के समान कठोरतम इस्पात को भी काट सकते हैं; कुछ ऐसे हे, जो पतभड़-से जीर्ण-शीर्ण आत्मा का वास- न्तिक निर्माण करते है, और कुछ ऐडे हे जो फूल की कोमल कली की तरह वनदेवी की गोद में मचल रहे हें।

मैथिली लोक-साहित्य के आकाश में गीतों के विहंगस अहनिश उंड़ते-

फिरते हैं । जनवरी से दिसम्बर तक बारहों महीने गीतों की बहार रहती है | स्फृत्तिप्रद भोजन, और आहार-विहार जिस तरह जं.वन का आवश्यक अंग है, उसी तरह मीठे नेसगिक गीतों का प्रेम-गान भी यहाँ के लोगों के जीवन का देनिक अंग बन गया है । पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, शिशु-जन्म, उपनयन, विवाह आदि षोड़श संस्कारों की बात का तो कहना ही क्या? प्रात: दुपहरी, संध्या, मध्यनिशा आदि भिन्न-भिन्न समय के लिए भी यहाँ भिन्न- भिन्न शैली के गीत ईजाद किये गये हें। चववयस्क और युवक-युवतियों के अतिरिक्त यहाँ छोटे-छोटे बच्चे भी स्वर्गीय संगीत की मंकार से स्थ,नीय वातावरण को प्रतिध्वनित करते रहते हैं। वे अपनी काव्य-सहचरी को मिट्टी के पकवान बना कर तृप्त करते, और “जो माला” तथा करौंदे’ की लटकन से झूंगार कर धूछ के रंगमहल में उसके साथ क्रीड़ा करते हें।

मिथिला के इन ग्रामीण गीतों को पुनरुज्जीवन प्रदान करने का अधिक श्रेय ऊग्न-उत्सवों और हिन्दू पव॑-त्यौहारों को है । संगीतमय हिन्दू-त्याहारों में रक्षा-बन्चन, तीज, यम-ह्वि तीया, दीपमालिका और छठ उल्लेखनीय हें। कंजरों के दल जो अपने काफिलों के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पड़ाव डालते फिरते हं, पुरातन लॉक-गीतों के चलते-फिरते पुस्तकालय हैं । लग्न-उत्सवों पर खँजरी बजा-बजा कर मंगलात्मक बध, ई-गीत गाना इनकी जीविका का साधन है।

लोक-गीतों को प्रोत्साहन देने में मुसलमानों के करुण पुर-दर्द मस्यों का भी, जो मुहरंभ के दिनों में हसन-हुसन की याद में गाये जाते हें, बड़ा जबरदस्त हाथ ह। ताजिये की निश्चित तिथि से कई-कई दिल पूर्व ही बाँस की खपाचों के वने बाजे बजा-बजा कर हिन्दू-मुसलमान सम्मिलित स्व॒रों से गान करते हे, और उक्त तिथि के पहुँचने पर रंग-बिरंगे कागज के बने वाजियों को सिर पर लेकर स्त्री-पुरुषों की टोलियां जमींदारों के दरवाजों की फेरी रूगराती हें। कबंला की संवेदनशील अभिव्यंजना के साथ-साथ इनमें वीर-रस की लड़ाइयों का भी पुरजोश जिक्र आया हैं, जिनका छुक-एक लफ्ज इस्लाम के बुलन्द सितारे की दुन्दुभि है।

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